‘असाध्य वीणा’ एक ऐसी कविता है जहाँ अस्तित्ववादी प्रश्न उठते हैं, पर उत्तर भारतीय दार्शनिक परंपरा देती है। व्याख्या करें|अथवा प्रियंवद न तो सार्त्र का विद्रोही नायक है, न कामू का सिसिफस। वह भारतीय साधक है, जो अस्तित्व की समस्या का समाधान मौन, समर्पण और लय में खोजता है।

यह कथन प्रियंवद के अस्तित्ववादी स्वरूप का सार है। इसे स्पष्ट करने के लिए इसे तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—(1) सार्त्र से भिन्नता, (2) कामू से भिन्नता, (3) भारतीय साधक के रूप में प्रियंवद की विशिष्टता।
1. प्रियंवद और सार्त्र का विद्रोही नायक : भिन्नता
सार्त्र का विद्रोही नायक वह है जो—
उसका विद्रोह बाहरी सत्ता से नहीं, बल्कि अर्थहीन ब्रह्मांड के विरुद्ध अर्थ-निर्माण का प्रयास है। वह कहता है—
मैं ही अपने कर्मों से अपना सार बनाऊँगा।
इसके विपरीत प्रियंवद अर्थ का निर्माण नहीं करता।
वह वीणा को बजाकर अपनी प्रतिभा सिद्ध नहीं करना चाहता।
वह कहता है—
“मैं कलावंत हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ।”
यहाँ विद्रोह है, लेकिन वह अहं-प्रतिष्ठा के विरुद्ध है, न कि सत्ता या परिस्थिति के विरुद्ध।
प्रियंवद का अस्तित्ववादी निर्णय यह है कि—
इसलिए वह सार्त्र का विद्रोही नायक नहीं, क्योंकि वह स्वतंत्रता को अहं के विस्तार के लिए नहीं, बल्कि अहं के विसर्जन के लिए चुनता है।
2. प्रियंवद और कामू का सिसिफस : भिन्नता
कामू का सिसिफस—
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निरर्थक जीवन को जानता है,
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फिर भी उसी निरर्थकता को स्वीकार कर
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चट्टान ढोते रहने में विद्रोही गरिमा खोजता है।
कामू के लिए समाधान है—
अर्थहीनता को जानते हुए भी जीते रहना।
प्रियंवद इस बिंदु पर भी अलग है।
उसके लिए जीवन निरर्थक (Absurd) नहीं है।
वह कहता है—
“वह तो सब कुछ की तथता थी।”
यहाँ ‘तथता’ (Suchness) का अर्थ है—
जीवन जैसा है, वैसा ही पूर्ण और पर्याप्त।
प्रियंवद न तो जीवन से संघर्ष करता है,
न उसे व्यर्थ मानकर ढोता है।
वह जीवन को सुनता है,
उसमें लय खोजता है
और उसी में विलीन हो जाता है।
इसलिए वह कामू का सिसिफस नहीं,
जो चट्टान के सामने खड़ा है,
बल्कि वह साधक है
जो चट्टान, पवन, नाद—सबमें एक ही स्पंदन सुनता है।
3. भारतीय साधक के रूप में प्रियंवद : समाधान का मार्ग
प्रियंवद का समाधान तीन भारतीय अवधारणाओं पर आधारित है—
(क) मौन
यह मौन—
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पलायन नहीं,
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बल्कि परम अभिव्यक्ति है।
भारतीय दर्शन में सत्य शब्दों से परे है।
इसलिए प्रियंवद वीणा को बजाता नहीं,
बल्कि मौन होकर उसे होने देता है।
(ख) समर्पण
प्रियंवद स्वयं को—
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वीणा को,
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तरु को,
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नाद को
सौंप देता है।
यह समर्पण कमजोरी नहीं,
बल्कि अहंकार से मुक्ति है।
यहीं अस्तित्व का भार हल्का हो जाता है।
(ग) लय
पाश्चात्य अस्तित्ववाद में जीवन संघर्ष है,
भारतीय दृष्टि में जीवन लय है।
प्रियंवद जीवन से टकराता नहीं,
उसकी लय में बह जाता है।
यही कारण है कि संगीत स्वयंभू हो उठता है।
निष्कर्ष (कथन का निहितार्थ)
इस कथन का गूढ़ अर्थ यह है कि—
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सार्त्र का नायक अर्थ गढ़ता है,
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कामू का नायक अर्थहीनता सहता है,
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जबकि प्रियंवद अर्थ की आवश्यकता से ही मुक्त हो जाता है।
वह अस्तित्व की समस्या का समाधान
न विद्रोह में,
न संघर्ष में,
बल्कि—
मौन में,
समर्पण में,
और जीवन की लय में विलय में खोजता है।
यही ‘असाध्य वीणा’ का भारतीय अस्तित्ववादी निष्कर्ष है।