‘कुकुरमुत्ता’ : एक मार्क्सवादी आलोचना

निराला की कविता ‘कुकुरमुत्ता’ मूलतः एक वर्ग-संघर्ष की कविता है, जिसमें प्रकृति और सौंदर्य के प्रतीकों के माध्यम से पूँजीवादी-सामंती व्यवस्था तथा श्रमिक-लोक जीवन के बीच का द्वंद्व उभरकर सामने आता है। यह कविता मार्क्स के उस सिद्धांत को काव्यात्मक रूप देती है कि समाज की संरचना का निर्धारण उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण और वर्गीय संबंधों से होता है।
1. नवाब का बाग़ : उत्पादन के साधनों पर शासक वर्ग का अधिकार
कविता का प्रारंभ नवाब और उसके बाग़ के वर्णन से होता है—
“एक थे नव्वाब,
फ़ारस के मँगाए थे गुलाब।”
मार्क्सवादी दृष्टि से यह बाग़ केवल सौंदर्य का स्थल नहीं, बल्कि उत्पादन-साधनों पर शासक वर्ग के एकाधिकार का प्रतीक है। बाग़ में लगे पौधे, फूल, फव्वारे और झरने उस अधिशेष मूल्य (Surplus Value) का परिणाम हैं, जिसे नवाब अपने अधीनस्थों के श्रम से प्राप्त करता है। माली, नौकर, साईस—सबका श्रम नवाब के ऐश्वर्य में बदल जाता है।
2. गुलाब : पूँजीवादी वस्तु और शोषण का सौंदर्य
गुलाब यहाँ एक वस्तु (commodity) है—जिसका मूल्य उसके श्रम से नहीं, उसकी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा से तय होता है। कुकुरमुत्ता गुलाब पर सीधा आरोप लगाता है—
“ख़ून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतराता है केपीटलिस्ट!”
यह कथन मार्क्स के उस विचार का काव्यात्मक रूप है कि पूँजीवादी वस्तु की सुंदरता के पीछे अदृश्य श्रम और शोषण छिपा होता है। गुलाब अपनी चमक में उस श्रम को ढँक देता है, जिसने उसे संभव बनाया।
3. कुकुरमुत्ता : स्वायत्त श्रम और श्रमिक वर्ग का प्रतीक
गुलाब के विपरीत कुकुरमुत्ता स्वयं को स्वतंत्र, स्वाभाविक और आत्मनिर्भर बताता है—
“अपने से उगा मैं
बिना दाने का चुगा मैं
क़लम मेरा नहीं लगता
मेरा जीवन आप जगता।”
मार्क्सवादी दृष्टि से कुकुरमुत्ता श्रमिक वर्ग का प्रतीक है—जो बिना पूँजी, बिना संरक्षण, बिना सत्ता के भी उत्पादन करता है। वह प्रकृति और श्रम के सीधे संबंध का प्रतिनिधि है, जहाँ उत्पादन और उपभोग के बीच कोई मध्यस्थ वर्ग नहीं।
4. सांस्कृतिक अधिशेष पर श्रमिक का अधिकार
कुकुरमुत्ता अपने आत्मविस्तार में दावा करता है कि कला, संगीत, साहित्य और सभ्यता का मूल स्रोत वही है—
“मुझी में ग़ोते लगाए वाल्मीकि-व्यास ने
मुझी से पोथे निकाले भास-कालिदास ने।”
यहाँ निराला यह दिखाते हैं कि सांस्कृतिक अधिशेष भी अंततः श्रमिक जीवन से उत्पन्न होता है, लेकिन उस पर अधिकार शासक वर्ग जमा लेता है। यह वही प्रक्रिया है जिसे मार्क्स विचारधारा (Ideology) कहता है—जहाँ शासक वर्ग के विचार ही समाज के प्रचलित विचार बन जाते हैं।
5. बाग़ के बाहर की बस्ती : वर्ग-विभाजन की भौतिक सच्चाई
कविता का दूसरा भाग उत्पादन-स्थल (बाग़) से श्रमिक जीवन-स्थल (झोंपड़ी) की ओर ले जाता है—
“बाग़ के बाहर पड़े थे झोंपड़े
दूर से जो दिख रहे थे अधगड़े।”
यह दृश्य वर्गीय असमानता का नग्न चित्र है। एक ओर नवाब का बाग़ है—दूसरी ओर बदहाली, गंदगी और बीमारी। यह विभाजन बताता है कि पूँजीवादी-सामंती समाज में समृद्धि और दरिद्रता साथ-साथ पैदा होती हैं।
6. गोली और बहार : वर्ग-चेतना का प्रारंभिक रूप
गोली (माली की बेटी) और बहार (नवाबज़ादी) का संबंध—
“दोनों के दिल मिले थे
तारे खुले-खिले थे।”
मार्क्सवादी दृष्टि से यह वर्ग-चेतना का प्रारंभिक मानवीय रूप है। यह संबंध अभी क्रांतिकारी नहीं, लेकिन यह दिखाता है कि वर्गीय दीवारें प्राकृतिक नहीं, सामाजिक हैं और मानवीय संपर्क से उनमें दरार पड़ सकती है।
7. कुकुरमुत्ता का भोजन बनना : उपयोग-मूल्य की विजय
जब बहार कुकुरमुत्ते का कबाब खाती है—
“ऐसा खाना आज तक नहीं खाया।”
यहाँ उपयोग-मूल्य (Use Value), विनिमय-मूल्य (Exchange Value) पर विजय प्राप्त करता है। गुलाब का मूल्य प्रतीकात्मक है, जबकि कुकुरमुत्ता जीवनदायी है। श्रमिक-उत्पाद पहली बार शासक वर्ग को वास्तविक तृप्ति देता है।
8. कुकुरमुत्ता का लोप : शोषण की चरम अवस्था
कविता का अंत—
“कुकुरमुत्ता अब उगाया नहीं उगता।”
मार्क्सवादी दृष्टि से यह पूँजीवादी शोषण की चरम अवस्था है, जहाँ स्वाभाविक, स्वतंत्र और श्रम-आधारित जीवन समाप्त हो चुका है। शासक वर्ग तब उसकी आवश्यकता समझता है, जब वह नष्ट हो चुका होता है। यह क्रांति की चूकी हुई संभावना का संकेत है।
निष्कर्ष
केवल मार्क्सवादी दृष्टि से ‘कुकुरमुत्ता’ श्रम बनाम पूँजी, उपयोग-मूल्य बनाम विनिमय-मूल्य, और उत्पादक वर्ग बनाम शासक वर्ग का काव्यात्मक दस्तावेज़ है। निराला इस कविता में यह स्थापित करते हैं कि जिस समाज में श्रम का सम्मान नहीं, वहाँ अंततः जीवन के मूल स्रोत—“कुकुरमुत्ता”—का लोप हो जाता है।