‘असाध्य वीणा’ : अस्तित्ववादी तुलनात्मक दृष्टि

अज्ञेय की कविता ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता में अस्तित्ववादी चेतना की सर्वाधिक सघन अभिव्यक्तियों में से एक है। यह कविता मनुष्य के अस्तित्व, आत्म-शोध, स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और अर्थबोध से जुड़े प्रश्नों को उठाती है। किंतु अज्ञेय का अस्तित्ववाद पाश्चात्य अस्तित्ववाद से भिन्न है—वह निराशा या विद्रोह पर नहीं, बल्कि आत्म-विसर्जन और महाशून्य में लय पर केंद्रित है। इसी बिंदु पर ‘असाध्य वीणा’ एक तुलनात्मक अस्तित्ववादी पाठ की माँग करती है।
1. अस्तित्व बनाम सार : सार्त्र और अज्ञेय
ज्याँ-पॉल सार्त्र का प्रसिद्ध कथन है—
Existence precedes essence (अस्तित्व सार से पहले आता है)।
सार्त्र के अनुसार मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और फिर अपने कर्मों द्वारा अपना सार गढ़ता है। ‘असाध्य वीणा’ में यह विचार प्रियंवद के चरित्र में परिलक्षित होता है। वह स्वयं को पहले से सिद्ध कलाकार नहीं मानता; वह कहता है—
“मैं कलावंत हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ।”
यह कथन सार्त्र के विचार से मेल खाता है कि मनुष्य पूर्वनिर्धारित सार लेकर नहीं आता। किंतु यहाँ अंतर यह है कि सार्त्र के यहाँ मनुष्य अपने सार का निर्माता है, जबकि अज्ञेय के यहाँ मनुष्य अपने सार को त्याग देता है। प्रियंवद सार गढ़ता नहीं, बल्कि स्वयं को शून्य कर देता है। इस प्रकार अज्ञेय का अस्तित्ववाद अहं-निर्माण नहीं, अहं-विसर्जन पर आधारित है।
2. स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व : अस्तित्ववादी चयन
अस्तित्ववाद में स्वतंत्रता केंद्रीय मूल्य है। सार्त्र के अनुसार मनुष्य “स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त” है। प्रियंवद भी पूर्णतः स्वतंत्र है—वह राजा के आदेश, सभा की अपेक्षा और सामाजिक दबाव को अस्वीकार करता है। वह वीणा को बजाने से इनकार करता है।
यह अस्तित्ववादी चयन है—
यहाँ प्रियंवद कामू के ‘विद्रोही मनुष्य’ जैसा है, जो व्यवस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि आत्म-विसंगति के विरुद्ध विद्रोह करता है। किंतु यह विद्रोह नकारात्मक नहीं, आत्मिक अनुशासन से उपजा है।
3. अकेलापन और आत्म-साक्षात्कार
पाश्चात्य अस्तित्ववाद में अकेलापन (Loneliness) और परित्यक्तता (Abandonment) केंद्रीय अनुभव हैं। किर्केगार्द के अनुसार मनुष्य ईश्वर के सामने एकाकी है। ‘असाध्य वीणा’ में प्रियंवद भी गहरे अकेलेपन में उतरता है—
“कंबल पर अभिमंत्रित एक अकेलेपन में डूब गया था।”
यह अकेलापन सामाजिक नहीं, अस्तित्वगत है। किंतु जहाँ पाश्चात्य अस्तित्ववाद में यह अकेलापन अक्सर व्यथा और निरर्थकता में बदल जाता है, वहीं अज्ञेय के यहाँ यह अकेलापन सृजनात्मक मौन बन जाता है। यहाँ अकेलापन अर्थहीनता नहीं, अर्थ की शर्त है।
4. निरर्थकता बनाम तथता
अल्बेयर कामू ने जीवन को ‘Absurd’ कहा—जहाँ मनुष्य अर्थ खोजता है, पर ब्रह्मांड मौन रहता है। ‘असाध्य वीणा’ में भी मौन है, किंतु वह अर्थहीन नहीं। प्रियंवद कहता है—
“वह तो सब कुछ की तथता थी।”
यहाँ ‘तथता’ (Suchness) बौद्ध दर्शन से जुड़ी अवधारणा है। जीवन निरर्थक नहीं, बल्कि अर्थ-आरोपण से मुक्त है। अज्ञेय का अस्तित्ववाद कामू के ‘अवसादपूर्ण निरर्थकता’ से भिन्न होकर स्वीकृतिपूर्ण तथता की ओर जाता है।
5. भाषा की असमर्थता और मौन
अस्तित्ववादी दर्शन में भाषा की सीमा एक महत्त्वपूर्ण विषय है। हाइडेगर ने कहा कि भाषा ‘Being’ को प्रकट भी करती है और छुपाती भी है। ‘असाध्य वीणा’ में यह विचार मौन के माध्यम से व्यक्त होता है।
प्रियंवद का संगीत शब्दों में नहीं, नाद और मौन में प्रकट होता है। यह हाइडेगर के उस विचार से मेल खाता है कि सत्य (Aletheia) उद्घाटन है—जो तभी होता है जब मनुष्य अपने अहं को हटाकर ‘होने’ को जगह देता है।
6. श्रोता की निजी अनुभूति : अस्तित्व की बहुलता
पाश्चात्य अस्तित्ववाद व्यक्ति की निजी अनुभूति पर बल देता है। कविता में हर श्रोता अलग अर्थ सुनता है—
यह अस्तित्ववादी सिद्धांत को पुष्ट करता है कि अर्थ सार्वभौमिक नहीं, अनुभूतिगत होता है। किंतु अज्ञेय यहाँ बहुलता को विघटन नहीं बनने देते; सभी अनुभूतियाँ अंततः एक महाशून्य में विलीन हो जाती हैं।
7. ईश्वर, ब्रह्म और शून्य
सार्त्र का अस्तित्ववाद नास्तिक है; ईश्वर की अनुपस्थिति मनुष्य को पूर्ण उत्तरदायित्व देती है। अज्ञेय का अस्तित्ववाद न तो पूर्णतः आस्तिक है, न नास्तिक। यहाँ ईश्वर किसी व्यक्ति-सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि महामौन, महाशून्य और नाद-ब्रह्म के रूप में उपस्थित है।
यह भारतीय दर्शन का योगदान है, जो अस्तित्ववाद को आध्यात्मिक आयाम देता है।
निष्कर्ष
अस्तित्ववादी तुलनात्मक दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ यह सिद्ध करती है कि—
-
पाश्चात्य अस्तित्ववाद अहं-केंद्रित स्वतंत्रता पर बल देता है,
-
जबकि अज्ञेय का अस्तित्ववाद अहं-विसर्जन द्वारा मुक्ति पर।