साक्षात्कार के लिए हिंदी साहित्य से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न श्रृंखला-2
1. काव्य प्रयोजन क्या होता है?
कविता का उद्देश्य काव्य प्रयोजन होता है।
a) व्यैक्तिक आनंद के लिए अनुभव को व्यक्त करना
b) यश के लिए कविता की रचना
c) अर्थ प्राप्ति हेतु रीतिकाल
d) उपदेश हेतु
व्यक्तिगत अनुभव की अभिव्यक्ति (आत्मकथा, संघर्ष, अस्मिता)
सामाजिक यथार्थ का उद्घाटन (गरीबी, जाति, राजनीति, स्त्री प्रश्न)
मानवीय संवेदना का विकास
प्रतिरोध और प्रश्नाकुलता (व्यवस्था-विरोध)
सौंदर्य और आनंद की अनुभूति
👉 आज कविता केवल यश या उपदेश तक सीमित नहीं, बल्कि सच बोलने का माध्यम है।
2. शब्द शक्ति क्या है
शब्द शक्ति वह माध्यम है जो शब्द का अर्थ बताती है।
शब्द/वाचक - जो बोध कराए
अर्थ/ वाच्य - जो बोध है
अभिधा - जिससे शब्द का मुख्य/प्रसिद्ध अर्थ मिलता है
लक्षण - मुख्य प्रसिद्ध अर्थ बाधित होने पर जिस शक्ति से एक अन्य अर्थ मिलता है उस लक्षणा कहते है। व्यंजना - जहाँ अभिधा या लक्षणा से अर्थ न मिले कोई तीसरी शक्ति अर्थ दे व्यंजना कहलाती है।
अभिधा – सीधा, सामान्य अर्थ (समाचार, रिपोर्ट)
लक्षणा – संकेतात्मक अर्थ (राजनीतिक व्यंग्य)
व्यंजना – गूढ़, प्रतीकात्मक अर्थ (समकालीन कविता का मूल)
👉 आज की कविता में व्यंजना सबसे प्रभावी शक्ति है क्योंकि अर्थ सीधे नहीं, संकेतों में आता है।
3. रस क्या है
रस का अर्थ आनंद है। यदि हम कहते हैं कि कविता रसात्मक है तो इसका अर्थ है कि कविता आनन्ददायक है।
o रस स्वयं कवि में नीहित है
o रस कवि में नहीं उसकी रचना के पात्रों में निहित है
o रस कवि या पात्र में नहीं मंचित पात्र को देखने में है
o रस पाठक या दर्शक में है
रस कविता का ही नहीं, जीवन का भी आयाम है ।
रस नौ हैं -
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स्थायी भाव |
रस |
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रति या प्रेम |
श्रृंगार |
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हंसी |
हास्य |
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शोक |
करूण |
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क्रोध |
रौद्र |
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उत्साह/ओज |
वीर |
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जुजुप्सा |
वीभत्स |
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विस्मय |
अदभूत |
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वैराग्य |
शांत |
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भय |
भयानक |
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वात्सल्य |
वत्सल |
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भागवत विषयक प्रेम |
भक्ति |
भरत मुनि की परिभाषा - स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारि के सहयोग से रस निकलता है।
स्थायी भाव – किसी भी भाव में आश्रय/ जिसके द्वारा भाव उत्पन्न हुआ है
विभाव - जिसके कारण मन में कोई भाव उत्पन्न हुआ है।
अनुभाव - जो भाव का अनुभव करा दे। कायिक - जो शरीर से उत्पन्न हुआ है, सात्विक - सहज रूप से भीतर से पैदा हो
संचारी भाव - एक जगह नहीं ठहरने वाले भाव
रस केवल शास्त्रीय नहीं, जीवनानुभव से जुड़ा है
आज के साहित्य में प्रमुख रस:
करुण – विस्थापन, बेरोज़गारी
वीर – प्रतिरोध, आंदोलन
रौद्र – आक्रोश, अन्याय के विरुद्ध
शांत – आत्मचिंतन
👉 आज रस पाठक में उत्पन्न होता है, न कि केवल कवि या पात्र में।
4. अलंकार क्या है
अर्थ-आभूषण। शब्द और अर्थ के सौन्दर्य को अलंकार के जरिए और बढ़ाया जाता है।
अलंकार के भेद:
शब्दालंकार - शब्द पर आश्रित अलंकार अर्थात यदि कोई शब्द बदल जाए तो अलंकार नष्ट हो जाए
1. छेकाअनुप्रास - अनेक वर्णों की यदि एक बार स्वरूपता औेर क्रमशः आवृति छेकानुप्रास है।
उदा॰: बंदौ गुरूपद
2. वृत्यानुप्रास - एक वर्ण की एक बार या अनेक बार आवृति
उदा॰: पलक पराग- पल पलक
3. लाटारनुप्रास - एक ही शब्द अर्थ की आवृति को लाटानुप्रास कहते हैं।
उदा॰: लड़की तो लड़की है
4- श्लेष - जहाँ एक शब्द में कई अर्थो का जुड़ा होना श्लिष्ट पद कहलाता है। जहाँ कविता में प्रयुकत शब्द के अनेक अर्थ होते हैं वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
उदा॰: रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून
पानी गए न उबरे मोती मानुष चून
5. वक्रोक्ति -श्लेष के कारण जब वक्ता के कथन का श्रोता अन्य अर्थ करे
उदा॰: कौ तुम? हैं घनश्याम हम ।
तो बरसों कित जाई॥
6. यमक - भिन्नार्थक प्रयोग किए गए शब्द का अर्थ हर बार अलग होता है।
उदा॰: माला फेरत जग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।
अर्थालंकार - अर्थ पर आश्रित अलंकार
1. उपमा - यहां किसी वस्तु की तुलना किसी अन्य वस्तु से की जाती है। उदा॰: पीपर पात सरिस मन डोला।
2. रूपक- जहां उपमेय और उपमान भिन्नता हो और वह एक रूप दिखाई दे।
उदा॰: चरण कमल बंदों हरि राइ।
3. उत्प्रेक्षा - जहां प्रस्तुत में अप्रस्तुत की संभावना व्यक्त की जाए ।
उदा॰: वृक्ष ताड़ का बढ़ता जाता मानो नभ को छूना चाहता।
4. भ्रांतिमान -जहां समानता के कारण उपमेय में उपमान की निश्चयात्मक प्रतीति हो और वह क्रियात्मक परिस्थिति में परिवर्तित हो जाए।
उदा॰: फिरत घरन नूतन पथिक चले चकित चित भागि।
फूल्यो देख पलास वन, समुहें समुझि दवागि ।।
5. सन्देह - यहां उसी वस्तु के समान दूसरी वस्तु की संदेह हो जाए ।
उदा॰: सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।
6. अतिशयोक्ति अलंकार- जहां किसी वस्तु का वर्णन बढ़ा चढ़ाकर किया जाए वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है ।
उदा॰: हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आगि, लंका सिगरी जल गई ,गए निशाचर भागी।।
7. विभावना अलंकार - जहां कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन किया जाता है विभावना अलंकार होता है।
उदा॰: चुभते ही तेरा अरुण बाण
कहते कण – कण से फूट – फूट
मधु के निर्झर के सजल गान ।
8. मानवीकरण- निर्जीव में सचिव के गुणों का आरोपण होता है।
उदा॰: फूल हँसे कलियाँ मुसकाई।
अलंकार स्वतःस्फूर्त होते हैं, सजावटी नहीं
मानवीकरण, व्यंग्य, प्रतीक, बिंब अधिक प्रचलित
कविता में अलंकार भाव को गहरा करने का साधन है, दिखावा नहीं
👉 आज अलंकार भाव के अधीन हैं, भाव अलंकार के नहीं।
5. नायकभेद
भरत ने नाटक के नायक के चार भेद किए हैं
आज का नायक:
राजा या देव नहीं, सामान्य मनुष्य
संघर्षशील, असंतुष्ट, प्रश्न करने वाला
स्त्री, दलित, मजदूर, आदिवासी भी नायक
👉 आधुनिक साहित्य में नायक की अवधारणा लोकतांत्रिक हो गई है।
6. नायिका भेद
निष्ठा के आधार पर
आज नायिका स्वतंत्र व्यक्तित्व है
वह केवल प्रेमिका नहीं, निर्णय लेने वाली स्त्री है
विवाह-केंद्रित दृष्टि टूट चुकी है
👉 आधुनिक साहित्य में नायिका विषय नहीं, कर्ता है।
7. हिन्दी साहित्य का काल विभाजन
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काल |
कालक्रम की दृष्टि से |
प्रवृत्ति की दृष्टि से |
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सम्वत् 1050-1375 |
आदि काल |
वीरगाथात्मक |
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सम्वत् 1375--1700 |
पूर्व-मध्य काल |
भक्तिकाल |
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सम्वत् 1700-1900 |
उत्तर मध्य काल |
रीतिकाल |
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सम्वत्1900 -अबतक |
आधुनिक काल |
गद्यकाल |
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