मैला आँचल के स्त्री एवं पुरुष पात्रों की समीक्षा

फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल हिन्दी साहित्य का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आंचलिक उपन्यास है। यह उपन्यास न केवल कथा-वस्तु की दृष्टि से विशिष्ट है, बल्कि अपने पात्र-विधान के कारण भी हिन्दी उपन्यास परम्परा में एक अलग स्थान रखता है। इस उपन्यास में परम्परागत अर्थों में कोई एक नायक या नायिका नहीं है। रेणु ने व्यक्ति-केन्द्रित कथा के स्थान पर सामूहिक जीवन को केन्द्र में रखा है और मेरीगंज गाँव को ही उपन्यास का वास्तविक नायक बना दिया है। उपन्यास के स्त्री और पुरुष पात्र इसी मेरीगंज के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ के प्रतिनिधि हैं।
पुरुष पात्रों की समीक्षा
मैला आँचल के पुरुष पात्र भारतीय ग्रामीण समाज में व्याप्त शोषण, सत्ता-लोलुपता, आदर्शवाद, संघर्ष और विडम्बना को विविध रूपों में प्रस्तुत करते हैं।
तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद उपन्यास के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद पात्रों में से एक हैं। वे सामन्ती, पूँजीवादी और औपनिवेशिक मानसिकता के प्रतीक हैं। छल-कपट, रिश्वत, हिंसा और राजनीतिक अवसरवाद उनके चरित्र की मूल विशेषताएँ हैं। सन्थालों के भूमि-संघर्ष को जातीय संघर्ष में बदलकर वे ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का खुला प्रयोग करते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के उभार को भाँपकर कांग्रेस में शामिल होना और सत्ता के नए केन्द्रों पर कब्ज़ा जमाना उनकी चतुराई को दर्शाता है। हालाँकि उपन्यास के अंत में उनका हृदय-परिवर्तन कथानक को कुछ हद तक कमजोर करता है, फिर भी उनका चरित्र तत्कालीन राजनीति और प्रशासन की सच्चाई को उजागर करने में सफल रहता है।
रामखेलावन यादव और रामकिरपाल सिंह जैसे पात्र यह सिद्ध करते हैं कि शोषण केवल ऊँची जातियों तक सीमित नहीं है। सम्पन्न पिछड़ी जातियाँ और राजपूत वर्ग भी उसी शोषण-व्यवस्था का हिस्सा हैं। इन पात्रों के माध्यम से रेणु यह स्पष्ट करते हैं कि वर्गीय स्वार्थ जातीय एकता से अधिक प्रभावशाली होता है। रामखेलावन यादव का पतन और रामकिरपाल सिंह की असफलता ग्रामीण समाज की आन्तरिक विडम्बनाओं को उजागर करती है।
डॉ. प्रशान्त उपन्यास के सबसे उज्ज्वल और आदर्शवादी पात्र हैं। वे आधुनिक वैज्ञानिक चेतना, मानवीय संवेदना और सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रतीक हैं। गरीबों की निःस्वार्थ सेवा, महामारी के सामाजिक कारणों की पहचान और अन्याय के प्रति उनका नैतिक प्रतिरोध उन्हें रेणु का स्वप्न-पात्र बनाता है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि बीमारी की जड़ केवल जीवाणु नहीं, बल्कि गरीबी और अज्ञानता है। डॉ. प्रशान्त उपन्यास के दमघोंटू वातावरण में आशा और प्रकाश का संचार करते हैं।
बावनदास गांधीवादी आदर्शों के प्रतिनिधि हैं। वे ईमानदारी, सत्य और अहिंसा में विश्वास रखते हैं, लेकिन स्वतंत्र भारत की राजनीतिक वास्तविकता में वे असहाय सिद्ध होते हैं। उनकी मृत्यु आधुनिक हिन्दी साहित्य की सबसे करुण और अर्थपूर्ण मौतों में से एक है। होरी की तरह, बावनदास की मृत्यु मानवीय मूल्यों की पराजय और अमानवीय शक्तियों की विजय का प्रतीक बन जाती है।
कालीचरण जन-जागरण और प्रतिरोध की चेतना के वाहक हैं। वे पिछड़ी जातियों में आत्मसम्मान जगाने का प्रयास करते हैं और कई अवसरों पर साहस का परिचय देते हैं। परन्तु उनमें दूरदर्शिता और राजनीतिक समझ का अभाव है, जिसके कारण वे कई बार शोषक शक्तियों के हाथों बहक जाते हैं। यही कमजोरी उन्हें अत्यन्त मानवीय और यथार्थवादी बनाती है।
बालदेव स्वतंत्रता आंदोलन के पतनशील आदर्शों के प्रतीक हैं। गाँधीवादी विचारधारा में विश्वास रखने के बावजूद वे राजनीतिक समझ के अभाव में शोषक वर्ग के औजार बन जाते हैं। उनका चरित्र आज़ादी के बाद कांग्रेस के भीतर आए अवसरवाद और वैचारिक पतन की ओर संकेत करता है।
स्त्री पात्रों की समीक्षा
मैला आँचल की स्त्रियाँ केवल सहानुभूति की पात्र नहीं हैं, बल्कि वे ग्रामीण समाज की जटिल सच्चाइयों को पूरी तीव्रता से प्रकट करती हैं।
लक्ष्मी उपन्यास की सबसे करुण और प्रभावशाली स्त्री पात्र हैं। मठ की पाखंडपूर्ण व्यवस्था और महन्त की कामवासना की शिकार लक्ष्मी का जीवन स्त्री-शोषण का जीवंत दस्तावेज है। उनके माध्यम से रेणु धार्मिक संस्थाओं के नैतिक पतन और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की क्रूरता को उजागर करते हैं।
कमली, तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद की पुत्री, अंधविश्वास और सामाजिक भय की शिकार है। उसे अपशकुनी मानने की धारणा स्त्री के प्रति समाज की अमानवीय सोच को उजागर करती है। डॉ. प्रशान्त से प्रेम के माध्यम से उसमें आत्मविश्वास और आधुनिक चेतना का विकास होता है। वह परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व का प्रतीक है।
फुलिया, रामप्यारी, रमजू की माँ और फुलिया की माँ जैसी स्त्रियाँ ग्रामीण समाज की नैतिक विडम्बनाओं को सामने लाती हैं। ये स्त्रियाँ मुक्त यौन-संबंधों में विश्वास करती हैं, परन्तु यह स्वतंत्रता भी दरअसल उसी सामाजिक अव्यवस्था और शोषण का परिणाम है, जिसमें नैतिकता के स्पष्ट मानदण्ड नहीं रह जाते।
निष्कर्ष
मैला आँचल के स्त्री और पुरुष पात्र किसी एक नैतिक श्रेणी में बाँधे नहीं जा सकते। यही रेणु की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनके पात्र—
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जीवन से सीधे जुड़े हुए हैं,
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वर्ग, जाति, राजनीति और अंधविश्वास की जटिल संरचना को उजागर करते हैं,
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और पाठक के विवेक को गहराई से झकझोरते हैं।
अज्ञेय के शब्दों में, रेणु ने ऐसे स्मरणीय चरित्र रचे हैं, जो केवल हमारी स्मृति में ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन-बोध में भी स्थायी रूप से बस जाते हैं। इस दृष्टि से मैला आँचल के स्त्री एवं पुरुष पात्र हिन्दी उपन्यास साहित्य की एक अमूल्य धरोहर हैं।