चरित्तर कर्मकार : लोकजीवन का जीवंत प्रतिनिधि

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ में चरित्तर कर्मकार एक ऐसा पात्र है जो किसी केंद्रीय नायक की तरह सामने नहीं आता, फिर भी पूरे उपन्यास की आत्मा में व्याप्त रहता है। वह ग्रामीण समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो इतिहास, राजनीति और सत्ता के केंद्र में नहीं होता, किंतु समाज की वास्तविक धुरी वही होता है। चरित्तर कर्मकार रेणु की लोकधर्मी दृष्टि, यथार्थबोध और मानवीय संवेदना का सजीव रूप है।
चरित्तर कर्मकार सामाजिक दृष्टि से एक निम्नवर्गीय श्रमिक है। उसकी पहचान उसकी जाति, पेशा और आर्थिक स्थिति से जुड़ी है। वह शोषण का शिकार है, पर पूरी तरह विवश या चेतनाशून्य नहीं। रेणु ने उसके माध्यम से यह दिखाया है कि ग्रामीण समाज का साधारण व्यक्ति भी परिस्थितियों को समझता है, सत्ता की चालों को पहचानता है और अपने ढंग से जीवन से जूझता है। चरित्तर कर्मकार का यथार्थबोध किसी वैचारिक शिक्षा से नहीं, बल्कि अनुभव से उपजा हुआ है।
चरित्तर कर्मकार की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यावहारिक बुद्धि है। वह बड़े आदर्शों या क्रांतिकारी नारों में विश्वास नहीं करता, बल्कि जीवन की ठोस सच्चाइयों को समझता है। राजनीति, चुनाव, नेताओं और सरकारी योजनाओं के प्रति उसका दृष्टिकोण भोला नहीं है। वह जानता है कि सत्ता किस तरह गरीबों का उपयोग करती है। यह समझ रेणु के अपने राजनीतिक अनुभवों से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।
भाषा के स्तर पर चरित्तर कर्मकार रेणु की रचनात्मक शक्ति का सबसे सशक्त उदाहरण है। उसकी भाषा शुद्ध साहित्यिक हिंदी नहीं, बल्कि लोकबोली से उपजी हुई जीवित भाषा है। मुहावरे, ठेठ शब्द और ग्रामीण लय उसके संवादों को प्रामाणिक बनाते हैं। यह भाषिक साम्य चरित्तर कर्मकार को रेणु का सबसे निकट आत्म-प्रतिरूप सिद्ध करता है।
मानवीय संवेदना चरित्तर कर्मकार के चरित्र का केंद्रीय तत्व है। वह दूसरों के दुःख को समझता है, क्योंकि वह स्वयं उसी दुःख का सहभागी है। उसकी करुणा उपदेशात्मक नहीं, बल्कि सह-अनुभूति से जन्मी है। रेणु का साहित्य भी इसी करुणा पर टिका है—जहाँ लेखक जनता के दुःख को बाहर से नहीं, भीतर से महसूस करता है।
चरित्तर कर्मकार न तो आदर्श नायक है, न विद्रोही क्रांतिकारी। वह जीवन को जैसा है वैसा स्वीकार करता है और उसी के भीतर अपने लिए अर्थ खोजता है। यही कारण है कि वह रेणु की रचनात्मक दृष्टि का सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि बन जाता है।
निष्कर्षतः, चरित्तर कर्मकार ग्रामीण भारत के साधारण मनुष्य का प्रतीक है और इसी कारण वह रेणु का सबसे निकट आत्म-प्रतिरूप माना जाता है।