“मैला आँचल में चरित्तर कर्मकार रेणु का सबसे निकट आत्म-प्रतिरूप है” : एक आलोचनात्मक विवेचन

फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास ‘मैला आँचल’ हिंदी साहित्य में आँचलिक यथार्थवाद की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में गिना जाता है। यह उपन्यास स्वतंत्रता के बाद के ग्रामीण भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जटिलताओं को अत्यंत आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लेखक किसी एक नायक को केंद्र में रखकर कथा नहीं रचता, बल्कि लोकजीवन को ही नायक बना देता है। फिर भी आलोचकों के बीच यह प्रश्न लंबे समय से चर्चा में रहा है कि रेणु ने अपने व्यक्तित्व को किस पात्र के माध्यम से सबसे अधिक व्यक्त किया है। इस संदर्भ में यह कथन अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है कि चरित्तर कर्मकार रेणु का सबसे निकट आत्म-प्रतिरूप है।
1. रेणु का रचनात्मक व्यक्तित्व और लोकधर्मिता
रेणु मूलतः लोकजीवन के लेखक हैं। उनका साहित्य न तो शुद्ध बौद्धिक विमर्श है, न ही केवल राजनीतिक घोषणापत्र। वे गाँव की मिट्टी, गंध, बोली, लोकविश्वास और जीवन-संघर्षों से गहरे जुड़े हुए रचनाकार हैं। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका लेखन “जनता की बोली में जनता के लिए” है। इस दृष्टि से रेणु का आत्म-प्रतिरूप वही पात्र हो सकता है जो लोकजीवन के सबसे निकट हो, न कि वह जो केवल शिक्षित या राजनीतिक चेतना का प्रतिनिधि हो।
चरित्तर कर्मकार इसी लोकधर्मी चेतना का सजीव रूप है। वह न तो उपन्यास का नायक है, न कोई आदर्शवादी सुधारक, बल्कि गाँव का साधारण श्रमिक है, जो जीवन को उसकी पूरी जटिलता और कठोरता के साथ जीता है। यही साधारणपन रेणु की रचनात्मक आत्मा का मूल है।
2. चरित्तर कर्मकार की सामाजिक स्थिति और रेणु की दृष्टि
चरित्तर कर्मकार एक निम्नवर्गीय श्रमिक है। वह जाति, वर्ग और आर्थिक शोषण की त्रिस्तरीय मार झेलता है। रेणु का साहित्य इसी शोषित वर्ग की पीड़ा और जिजीविषा को स्वर देता है। रेणु स्वयं किसी उच्चवर्गीय अभिजात दृष्टि से नहीं, बल्कि भीतर से देखे गए यथार्थ के लेखक हैं। चरित्तर कर्मकार की सामाजिक स्थिति रेणु की उसी दृष्टि को मूर्त करती है।
रेणु ग्रामीण समाज को न तो रोमानी बनाते हैं, न पूरी तरह अंधकारमय। चरित्तर कर्मकार भी इसी संतुलन का प्रतीक है। वह शोषित है, पर पराजित नहीं; विवश है, पर चेतनाशून्य नहीं। यह दृष्टि रेणु के यथार्थवाद की पहचान है।
3. यथार्थबोध और व्यावहारिक बुद्धि
चरित्तर कर्मकार का सबसे प्रमुख गुण है उसका यथार्थबोध। वह न तो राजनीतिक नारों से बहकता है, न आदर्शवादी सपनों में जीता है। वह जानता है कि सत्ता, राजनीति और जातिगत संरचनाएँ कैसे काम करती हैं। यही व्यावहारिक बुद्धि रेणु के अपने जीवनानुभवों से उपजी है।
रेणु का साहित्य किसी सिद्धांत से नहीं, बल्कि अनुभव से जन्म लेता है। चरित्तर कर्मकार की दृष्टि भी अनुभवजन्य है। वह जीवन को जैसा है वैसा स्वीकार करता है और उसी के भीतर अपने लिए रास्ता खोजता है। यह गुण उसे रेणु का आत्मीय प्रतिनिधि बनाता है।
4. मानवीय संवेदना और करुणा
रेणु के साहित्य की आत्मा करुणा है। वे शोषण का चित्रण करते हैं, पर घृणा नहीं रचते; वे पीड़ा दिखाते हैं, पर मनुष्यता का विश्वास नहीं खोते। चरित्तर कर्मकार में यह करुणा सहज रूप से विद्यमान है। दूसरों के दुःख के प्रति उसकी संवेदना किसी नैतिक उपदेश से नहीं, बल्कि साझे दुखभोग से उपजी है।
यह करुणा रेणु के अपने व्यक्तित्व की पहचान है। वे जनता के दुःख को बाहर से नहीं, भीतर से महसूस करते हैं। चरित्तर कर्मकार इसी भीतर से उपजी संवेदना का पात्र है।
5. भाषा और लोकसंस्कृति से जुड़ाव
रेणु की सबसे बड़ी शक्ति उनकी भाषा है—जो लोकबोली, मुहावरों और ग्रामीण लय से बनी है। चरित्तर कर्मकार की भाषा भी वही है। वह शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं बोलता, बल्कि गाँव की जीवित भाषा में सोचता और बोलता है।
यह भाषिक साम्य केवल शैली का प्रश्न नहीं, बल्कि दृष्टि का प्रश्न है। रेणु जिस भाषा में लिखते हैं, चरित्तर कर्मकार उसी भाषा में जीता है। इसीलिए वह रेणु का सबसे स्वाभाविक आत्म-प्रतिरूप बन जाता है।
6. प्रशांत और बाबन दास से तुलना
प्रशांत रेणु के बौद्धिक और आदर्शवादी पक्ष का प्रतिनिधि है। बाबन दास उनके राजनीतिक और विद्रोही पक्ष का। किंतु ये दोनों पात्र किसी न किसी रूप में एकांगी हैं। प्रशांत जीवन से कुछ दूर है, बाबन दास उग्रता में सीमित हो जाता है।
इसके विपरीत चरित्तर कर्मकार में—
रेणु का लेखन भी इसी समग्रता का लेखन है। इसलिए चरित्तर कर्मकार उनके सबसे निकट आत्म-प्रतिरूप के रूप में उभरता है।
7. प्रतीकात्मक महत्त्व
चरित्तर कर्मकार केवल एक पात्र नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के साधारण मनुष्य का प्रतीक है। रेणु स्वयं को इसी साधारण मनुष्य के पक्ष में खड़ा करते हैं। वे नायकत्व को तोड़ते हैं और साधारण को महत्त्व देते हैं। यही कारण है कि चरित्तर कर्मकार में रेणु की रचनात्मक आत्मा सबसे अधिक प्रतिबिंबित होती है।
निष्कर्ष
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि चरित्तर कर्मकार रेणु का सबसे निकट आत्म-प्रतिरूप है। उसमें रेणु का लोकधर्मी दृष्टिकोण, यथार्थबोध, मानवीय करुणा, भाषिक संवेदना और जीवनानुभव—सब एक साथ उपस्थित हैं। प्रशांत और बाबन दास रेणु के व्यक्तित्व के कुछ पक्षों को व्यक्त करते हैं, किंतु रेणु का संपूर्ण, जीवंत और लोकजीवी आत्म चरित्तर कर्मकार में ही सबसे पूर्ण रूप में अभिव्यक्त हुआ है।